ढोल-दमाऊ की प्राचीन विधाओं ने मोहा मन, बोले विशेषज्ञ—ढोल बचेगा तो ढोली भी बचेंगे

 

ऋषिकेश। मुनिकीरेती स्थित स्वामीनारायण आश्रम में आयोजित दो दिवसीय ‘धरोहर संवाद’ कार्यक्रम का समापन उत्तराखंड की पारंपरिक ढोल-दमाऊ वादन विधाओं की शानदार प्रस्तुतियों के साथ हुआ। कार्यक्रम में अल्मोड़ा, टिहरी, बागेश्वर और माणा सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे लोक कलाकारों ने ढोल, हुड़के और जागर की प्राचीन परंपराओं से लोगों को रूबरू कराया।

 

कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण टिहरी से पहुंचे प्रसिद्ध ढोलवादक डॉ. सोहनलाल की प्रस्तुति रही। उन्होंने मंत्रोच्चार के साथ ढोल वादन के नियम और विभिन्न तालों की बारीकियां समझाईं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड की ढोल परंपरा में सैकड़ों प्रकार की तालों के माध्यम से संवाद की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने विभिन्न तालों का सजीव प्रदर्शन भी किया।

 

बागेश्वर के ढोलवादक मोहन दास ने विजयसार की लकड़ी से बने पारंपरिक ढोल के साथ प्राचीन वादन शैलियों और जागरों की प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं बूढ़ाकेदार के बचन दास और अल्मोड़ा से पहुंचे हुड़का वादक सुंदर दास ने लोक संस्कृति की लुप्त होती विधाओं और लोक रचनाओं को अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत किया। माणा गांव के कुंदन सिंह कपोला ने महिलाओं की टीम के साथ कार्यक्रम में भागीदारी की।

 

‘ढोली को सम्मान और उचित मेहनताना जरूरी’

 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्कृतिकर्मी प्रो. डीआर पुरोहित ने कहा कि केवल ढोल को बचाने की बात करने से परंपरा सुरक्षित नहीं होगी। इसके लिए ढोल वादकों को सम्मान के साथ आर्थिक सुरक्षा और उचित पारिश्रमिक देना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि ढोल को आजीविका से जोड़कर युवा पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ा जा सकता है।

 

मुख्य अतिथि आरएसएस के प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने कहा कि ऐसे आयोजन उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने ‘अपनी धरोहर’ संस्था के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पारंपरिक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

 

अपनी धरोहर संस्था के अध्यक्ष विजय भट्ट ने कहा कि धरोहर संवाद का उद्देश्य केवल ढोल वादन का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि ढोल-दमाऊ से जुड़े पारंपरिक ज्ञान, कौशल, विभिन्न वादन शैलियों और उनके सांस्कृतिक महत्व को समाज के सामने लाना है।

 

साहित्यकार एवं गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने ढोल के इतिहास, इसकी परंपराओं और उत्तराखंड के लोकजीवन में इसके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

 

कार्यक्रम का संचालन नीलम ध्यानी जुयाल ने किया। इस अवसर पर अपनी धरोहर संस्था के अध्यक्ष विजय भट्ट, महामंत्री दिनेश बम, डॉ. श्याम सिंह कार्की, नगर उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष राजेश भट्ट, वीरेंद्र बिष्ट, कमल जीना, टीएचडीसी के मुख्य तकनीकी अधिकारी एलपी जोशी, सुनीता पंवार, मधु असवाल, योगाचार्य डॉ. नवदीप जोशी, संजय शास्त्री, पूर्व प्रधानाचार्य डीबीपीएस रावत, सुरेंद्र रावत सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

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