लोकभाषा के शब्दों में लिपटा छल
उत्तराखण्ड की आत्मा पर सौम्य प्रहार
प्रधानमंत्री का देहरादून आगमन, उत्तराखण्ड स्थापना दिवस के पच्चीस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर, एक ऐतिहासिक क्षण माना जा सकता था यदि यह स्मरण केवल भाषणों का उत्सव न बनकर आत्ममंथन का पर्व बनता। परंतु हुआ वही जो प्रायः होता आया है शब्दों का श्रृंगार, भावनाओं का लोलीपॉप, और जनता के जख्मों पर भाषाई मरहम।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषा के कुछ शब्दों का उच्चारण किया “मेरे भै, मेरी भुली दाणा स्याण।” सभागार तालियों से गूँज उठा, चेहरे खिल उठे, कैमरे झूमने लगे। पर इस हर्षोल्लास के पीछे एक गंभीर प्रश्न अब भी मौन पड़ा है क्या मात्र कुछ स्थानीय शब्दों के उच्चारण से किसी क्षेत्रीय अस्मिता का उद्धार संभव है? क्या भाषा की आत्मा केवल राजनीतिक उच्चारणों में सिमट जानी चाहिए?
उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय भाषाएँ गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी, थारू, राजी, भोटिया अपनी समृद्ध परंपरा, मिथक और लोकज्ञान की संवाहक रही हैं। परंतु राज्य बनने के पच्चीस वर्ष बाद भी इन भाषाओं के संरक्षण हेतु कोई राज्यभाषा अकादमी अस्तित्व में नहीं है। दिल्ली सरकार ने जहाँ भोजपुरी, मैथिली, हरियाणवी और उर्दू तक के लिए भाषा अकादमियाँ गठित कीं, वहीं उत्तराखण्ड में यह विमर्श अभी तक फाइलों की निद्रा में है।
लोककला, लोकभाषा और लोकस्मृति का यह परित्याग केवल सांस्कृतिक उपेक्षा नहीं, बल्कि अस्तित्व का अपमान है।
प्रधानमंत्री के भाषण में विकास के जो आंकड़े उछाले गए “आठ हजार दो सो करोड़ की योजनाएँ” वे सुनने में भले दैदीप्यमान लगें, पर उनके स्रोत, समयसीमा और जवाबदेही का कोई ठोस उल्लेख नहीं किया गया। आंकड़ों की चकाचौंध में सच्चाई गुम है राज्य 79 सो करोड़ के कर्ज़ में डूबा हुआ है, योजनाओं की कार्यान्वयन प्रक्रिया धुंध में लिपटी है, और जनता भ्रम के जाल में उलझी है।
देहरादून में भाषण हुआ, पर सैनिक धाम का उद्घाटन नहीं हुआ। सैनिक धाम पर एक भी शब्द नहीं फूटे।
उन्होंने आंदोलनकारियों की बात की, पर खटीमा, मसूरी और मुज़फ्फरनगर गोलीकांड के दोषियों पर मौन साधा रहा।
हर वर्ष “न्याय होगा” का आश्वासन दोहराया जाता है, पर न्याय की प्रक्रिया अब भी प्रशासनिक भूलभुलैया में भटक रही है।
आंदोलनकारियों को दी गई पेंशन जो मनरेगा मज़दूर की दिहाड़ी से भी कम है उस अपमान को किसी भाषण के शब्द नहीं ढँक सकते।
शिक्षा, चिकित्सा, नवाचार, भू-कानून, खनन, पलायन, वन अधिनियम उच्च शिक्षा, रोजगार ये सभी विषय, जिनसे राज्य का भविष्य गढ़ा जाना था, मंच से नदारद रहे।
राजधानी गैरसैंण पर कोई घोषणा नहीं हुई।
वन अधिनियम और भूमि अधिग्रहण कानूनों में हो रहे परिवर्तन पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
यह सब प्रश्न, जो जनता के मन में ज्वालामुखी की तरह सुलगते हैं, भाषण की लिपि में कहीं नहीं थे।
भाषा की बात करते हुए यदि मूल भाषा का हृदय ही उपेक्षित हो, तो यह स्थिति विडंबनापूर्ण है। उत्तराखण्ड में गढ़वाली या कुमाऊँनी बोलने वाला व्यक्ति शिक्षण संस्थानों में अपनी भाषा का कोई औपचारिक पाठ्यक्रम नहीं देखता। साहित्यकार, कवि, लोकगायक सब अपनी जड़ों के साथ ठगे जा रहे हैं। सरकारी प्रोत्साहन केवल अवसरवादी सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रह गया है जहाँ भाषाएँ मंच सजाने की वस्तु हैं, संरक्षण का उद्देश्य नहीं। पहाड़ी भाषावो को आठवी अनुसूची में रखने की कोई बात नहीं हुई।
यह समय आत्ममुग्धता नहीं, आत्मसमीक्षा का है।
राज्य की जनता को यह समझना होगा कि विकास केवल उद्घाटन पट्टिकाओं और संख्याओं का खेल नहीं है। यह जनता के अधिकारों, उनकी भाषा, संस्कृति और अस्तित्व की सुरक्षा का नाम है।
प्रधानमंत्री का गढ़वाली-कुमाऊँनी में अभिवादन सराहनीय हो सकता है, परंतु यदि वह नीति नहीं, नाट्य का अंग है तो यह “लोकभाषा के शब्दों में लिपटा छल” मात्र रह जाएगा। यदि वे अपने पहाड़ी भाषा में दिए गए भाषण को सार्थक बनाना चाहते हैं तो पहाड़ी भाषावो को आठवी अनुसूची में रखना जरुरी हैं।
उत्तराखण्ड की आत्मा आज भी वही प्रश्न दोहराती है “हमने राज्य माँगा था,
पर क्या हमें राज्य मिला या सिर्फ़ प्रशासनिक परिधि?” जब तक इन सवालों का उत्तर ईमानदारी से नहीं दिया जाएगा, हर मंच, हर भाषण, हर घोषणा केवल ‘स्याण भै भुली दाणा’ बनकर रह जाएगी. सुनने में मधुर, पर भीतर से खोखली।
देवेश आदमी
